अली हुसैन आसिम बिहारी के सपनों को साकार करने का संकल्प लें: वक्ताओं का आह्वान
137वें जन्मदिवस पर पसमांदा संगठनों का भव्य सम्मेलन, अधिकार और बराबरी की लड़ाई तेज़ करने का ऐलान
नई दिल्ली: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, दिल्ली में ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के बैनर तले एक महत्वपूर्ण और गरिमामय सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन पसमांदा आंदोलन के प्रणेता अली हुसैन आसिम बिहारी के 137वें जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित हुआ, जिसमें देशभर से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
सम्मेलन में वक्ताओं ने अली हुसैन आसिम बिहारी के संघर्ष और उनके विचारों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका आंदोलन आज भी पूरी तरह जीवंत और प्रासंगिक है। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि जब तक पसमांदा समाज को सम्मान, बराबरी और उनके संवैधानिक अधिकार नहीं मिलते, तब तक अली हुसैन आसिम बिहारी का सपना अधूरा रहेगा।
कार्यक्रम का संचालन ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हाफ़िज़ गुलाम सरवर ने किया। सम्मेलन में प्रो. डॉ. फिरोज़ मंसूरी, शारिक अदीब अंसारी, मेराज राइन, अब्दुल हकीम होवारी, गफ्फार सलमानी, तौफीक अहमद शाह, सलीम अहमद कुरैशी, मौलाना जाहिद आलम मजाहिरी, निखत परवीन, डॉ. अब्दुस्सलाम, अफशां बेगम, अलाउद्दीन सलमानी और समीर सैफी सहित कई प्रमुख हस्तियों ने अपने विचार रखे।
मेराज राइन, डायरेक्टर पसमांदा विकास फाउंडेशन ने अपने संबोधन में कहा कि समय की मांग है कि मुसलमान सरकारी योजनाओं का भरपूर लाभ उठाएं, ताकि वे सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। उन्होंने प्रधानमंत्री से पसमांदा आयोग के गठन की भी अपील की।
प्रोफेसर डॉ. फिरोज़ मंसूरी ने कहा कि हमें मजहबी मतभेदों से ऊपर उठकर शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब समय आ गया है कि पसमांदा मुसलमानों के विकास के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, और केंद्र सरकार से रोहिणी आयोग को लागू करने की मांग की।
शारिक अदीब अंसारी ने पसमांदा मुसलमानों की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सामाजिक अन्याय और असमानता को समाप्त करने के लिए संगठित संघर्ष जरूरी है।
अन्य वक्ताओं ने मिल्ली तंजीमों को संबोधित करते हुए कहा कि पसमांदा आंदोलन मूल रूप से एक सामाजिक आंदोलन है, इसमें अनावश्यक धार्मिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए। उन्होंने समाज से अपील की कि वे एकजुट होकर अपने अधिकारों की लड़ाई को और मजबूत करें।
हाफ़िज़ गुलाम सरवर ने अपने संबोधन में कहा कि उलेमा या तो इस आंदोलन का समर्थन करें या अपने धार्मिक कार्यों में लगे रहें। पसमांदा तहरीक को कमजोर करना या उसे गैर-इस्लामी बताना समाज के लिए ही नुकसानदेह होगा।
सम्मेलन में सभी संगठनों ने संयुक्त रूप से धार्मिक तंजीमों में पसमांदा समाज की अनदेखी पर गहरी चिंता व्यक्त की और राजनीतिक दलों से मांग की कि पसमांदा समाज को उनकी आबादी के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए।
